आमजन का भरोसा डगमगाया तो एसपी ने थाना प्रभारी और चौकी प्रभारियों की कुर्सियाँ हिल गईं 
कुर्सियाँ बदल गईं मगर सवाल यह है,क्या सिस्टम की 'जिर्रा' बदलेगी
एसपी का यह बड़ा फेरबदल यह संकेत तो देता है कि प्रशासन बिगड़ती स्थिति से निपटने के लिए गंभीर है
थाना प्रभारियों की कुर्सियाँ बदलना एक आवश्यक और तात्कालिक कदम हो सकता है
कटनी संवाददाता / लगातार बढ़ते अपराधों और पुलिस की अनुशासनहीनता से कटनी में खाकी की साख बुरी तरह दागदार हुई है। आमजन का भरोसा डगमगाया तो पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा को आखिरकार दीपावली से पहले बड़ा प्रशासनिक उठा-पटक करना पड़ा। सोमवार देर शाम जारी सूची में कई थानेदारों और चौकी प्रभारियों की कुर्सियाँ हिल गईं .
मगर, क्या मात्र कुर्सियाँ बदलने से कटनी की बिगड़ती कानून-व्यवस्था और अपराधों पर अंकुश लग पाएगा? यह वह सवाल है जो आम जनता से लेकर विशेषज्ञों तक को मथ रहा है। आइए, इस फेरबदल के पीछे के 'व्हाट्स एंड व्हाई' पर एक नजर डालते हैं।
क्यों हिलीं कुर्सियाँ? ये हैं वजहें
यह फेरबदल कोई सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि लगातार बिगड़ते हालात के मद्देनजर एक 'डैमेज कंट्रोल' का प्रयास है .
कोतवाली थाना: चौपाटी जैसे सार्वजनिक स्थल पर एक साथ तीन हत्याओं जैसे गंभीर मामले सामने आए, जिस पर त्वरित कार्रवाई नहीं हुई। इसी के चलते टीआई अजय सिंह को हटाकर कमान एक महिला अधिकारी राखी पांडे को सौंपी गई .
· रंगनाथ नगर थाना: यहाँ हत्या, बमबारी, चोरी और अवैध शराब तस्करी जैसे मामले सुर्खियों में रहे। थाना प्रभारी के नियंत्रण न होने का आरोप लगा और उनका तबादला कर दिया गया .
· एनकेजे थाना: हीरापुर कौड़िया में चाकूबाजी, शुष्क दिवस पर शराब बिक्री और सट्टे जैसे मामलों में पुलिस की त्वरित कार्रवाई न होना प्रमुख शिकायतें रहीं .
· बाकल थाना: यहाँ पदस्थ एक महिला उप निरीक्षक द्वारा सोशल मीडिया पर वर्दी में फोटो और रील्स वायरल करने जैसे 'स्वेच्छाचारिता' के चलते उन्हें हटा दिया गया .
* किसको कहाँ मिली नई जिम्मेदारी *
पुलिस अधीक्षक के आदेश के तहत हुए बदलावों की पूरी सूची कुछ इस प्रकार है:
अधिकारी का नाम पुराना पद नया पद
अजय बहादुर सिंह कोतवाली थाना प्रभारी रक्षित केंद्र कटनी
निरीक्षक राखी पांडे लाइन कोतवाली थाना प्रभारी
उप निरीक्षक अरुण पाल सिंह कोतवाली रंगनाथ नगर थाना प्रभारी
उप निरीक्षक नवीन नामदेव रंगनाथ नगर थाना प्रभारी माधव नगर थाना
उप निरीक्षक रूपेंद्र सिंह राजपूत साइबर सेल एनकेजे थाना प्रभारी
उप निरीक्षक अनिल यादव एनकेजे थाना प्रभारी स्लीमनाबाद थाना
उप निरीक्षक प्रतीक्षा सिंह चंदेल बाकल थाना प्रभारी कुठला थाना
उप निरीक्षक नेहा मौर्य निवार चौकी प्रभारी कोतवाली
सहायक उप निरीक्षक अंजनी मिश्रा स्लीमनाबाद निवार चौकी प्रभारी
* फेरबदल के पीछे का बड़ा सच *
हालाँकि, यह फेरबदल कुछ सवाल भी छोड़ गया है। सूत्र बताते हैं कि विभागीय जाँच का सामना कर चुके या विवादित रिकॉर्ड वाले कुछ अधिकारियों को नई जिम्मेदारी मिली है। एक जगह एसआई को हटाकर एएसआई को प्रभारी बनाया गया है, जबकि राखी पांडे जिन्हें महीने भर पहले ही लाइन भेजा गया था, उन्हें कोतवाली जैसे संवेदनशील थाने की कमान मिली। ये तथ्य इस पूरी कार्रवाई की गंभीरता और पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगाते हैं।
* सिस्टम की बुनियादी समस्याएँ: क्या केवल फेरबदल काफी है *
विशेषज्ञ मानते हैं कि अपराधों पर काबू पाने और जनता का विश्वास जीतने के लिए स्थानान्तरण एक तात्कालिक और सतही उपाय है। दरअसल, भारत की पुलिस व्यवस्था कुछ गहरी और बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है :
· कर्मियों की भारी कमी: संयुक्त राष्ट्र प्रति 1,00,000 लोगों पर 222 पुलिस अधिकारियों की अनुशंसा करता है, जबकि भारत में यह संख्या केवल 155 के करीब है। देश भर के राज्य पुलिस बलों में लगभग 21% से अधिक पद रिक्त हैं ।
· औपनिवेशिक मानसिकता: हमारी पुलिस प्रणाली आज भी 1861 के उस औपनिवेशिक पुलिस अधिनियम के ढाँचे पर चल रही है, जिसे जनता की सेवा के बजाय सत्ता के नियंत्रण के लिए बनाया गया था ।
· अत्यधिक कार्यभार और संसाधनों का अभाव: कर्मियों की कमी के चलते मौजूदा अधिकारियों पर कार्यभार बहुत अधिक है, जिसका सीधा असर जाँच की गुणवत्ता और अपराध नियंत्रण पर पड़ता है ।
*न्याय प्रणाली की चुनौतियाँ भी हैं बड़ी बाधा*
पुलिस प्रणाली के साथ-साथ, न्यायिक प्रणाली में मौजूद चुनौतियाँ भी कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित करती हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने खुद कहा था कि न्याय की आस में अदालत का दरवाजा खटखटाने वाला व्यक्ति अक्सर अपने फैसले पर पश्चाताप करता है .
लंबित मामलों का पहाड़: देश की निचली अदालतों में लगभग 3.8 करोड़ और उच्च न्यायालयों में 57 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। यह विशाल संख्या न्याय की गति को अवरुद्ध कर देती है .
· न्यायाधीशों की कमी: विभिन्न उच्च न्यायालयों में 400 से अधिक रिक्तियाँ हैं। न्यायिक नियुक्तियों की जटिल और अपारदर्शी कोलेजियम व्यवस्था भी इसका एक बड़ा कारण है .
* क्या है संभावित रास्ता *
पुलिस और न्यायिक सुधारों पर काम कर रहे जानकारों का मानना है कि स्थायी समाधान के लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं:
पुलिस का आधुनिकीकरण: 'स्मार्ट पुलिसिंग' जैसी पहलों को बढ़ावा देते हुए, एआई, डेटा एनालिटिक्स और फॉरेंसिक क्षमताओं को मजबूत करना ।
· सुधारात्मक न्याय पर जोर: नए आपराधिक कानून जेल की सजा के बजाय सामुदायिक सेवा जैसे सुधारात्मक उपायों की ओर इशारा करते हैं। छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाकर जुर्माने के दायरे में लाने जैसे कदम भी अदालतों के बोझ को कम कर सकते हैं ।
· ई-कोर्ट प्रोजेक्ट: न्यायपालिका के ई-कोर्ट मिशन जैसे प्रयास डिजिटल और पेपरलेस कोर्ट की ओर बढ़कर न्याय की प्रक्रिया को तेज करने में मददगार साबित हो रहे हैं ।
* निष्कर्ष: फेरबदल एक कदम है, मंजिल नहीं *
हालाँकि, अगर पुलिस बल को संसाधनों की कमी, अत्यधिक कार्यभार और औपनिवेशिक मानसिकता जैसी व्यवस्थागत बाधाओं का सामना करना पड़ता रहेगा, और अगर न्याय प्रणाली में करोड़ों मामले लंबित रहेंगे, तो केवल स्थानान्तरण से स्थिति में कोई बुनियादी सुधार की उम्मीद करना मृगतृष्णा होगी।