*कैप्टिव पावर विद्युत संशोधन 2026: वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर गंभीर खतरा*
*आम उपभोक्ता, कर्मचारी और पेंशनर्स भी बुरी तरह प्रभावित होंगे*
चीफ रिपोर्टर मध्य प्रदेश हाल ही में अधिसूचित विद्युत (संशोधन) नियम 2026 ने देश भर की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के राजस्व और वित्तीय स्थिरता पर गंभीर संकट के बादल मंडरा दिए हैं। मध्यप्रदेश विद्युत कर्मचारी संघ फेडरेशन के महामंत्री राकेश डी पी पाठक ने इन संशोधनों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इससे न केवल वितरण कंपनियां बल्कि आम उपभोक्ता, कर्मचारी और पेंशनर्स भी बुरी तरह प्रभावित होंगे।
कॉरपोरेट घरानों को मिली ढील, डिस्कॉम को होगा भारी नुकसान
राकेश डी पी पाठक ने बताया कि नए नियमों में किए गए कुछ प्रमुख बदलाव वितरण कंपनियों के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं:
· एकल कैप्टिव उपयोगकर्ता की परिभाषा विस्तारित: अब सहायक कंपनियों, होल्डिंग कंपनियों और समूह कंपनियों को मिलाकर एक ही कैप्टिव (स्व-उपयोग) उपयोगकर्ता माना जाएगा। इसका सीधा असर यह होगा कि बड़े कॉर्पोरेट समूह डिस्कॉम को दरकिनार कर अपने कैप्टिव पावर प्लांट से बिजली ले सकेंगे, जिससे वितरण कंपनियों के सबसे लाभदायक औद्योगिक उपभोक्ताओं का बड़े पैमाने पर पलायन होगा।
· भौगोलिक बाध्यता समाप्त: विभिन्न स्थानों पर स्थित समूह कंपनियों के बीच अब कैप्टिव बिजली वितरित की जा सकेगी। इससे डिस्कॉम की बिजली पर निर्भरता और कम हो जाएगी।
· ग्रुप कैप्टिव के लिए नियमों में ढील: अब यदि व्यक्तिगत सदस्य आनुपातिक खपत की सीमा का पालन नहीं भी करते हैं, तो भी पूरे समूह के सामूहिक खपत के आधार पर संयंत्र को 'कैप्टिव' का दर्जा मिल जाएगा। इससे डिस्कॉम की बिजली से बचना और आसान हो गया है।
· सत्यापन तक अधिभार न लगने का प्रावधान: कैप्टिव स्थिति के सत्यापन की प्रक्रिया लंबित रहने तक 'क्रॉस सब्सिडी सरचार्ज' (सीएसएस) और 'अतिरिक्त अधिभार' नहीं लगाया जाएगा, जिससे सत्यापन में देरी के दौरान डिस्कॉम को भारी राजस्व हानि होगी।
· व्यक्तिगत इकाई को कैप्टिव मानने की अनुमति: किसी उत्पादन केंद्र की मात्र एक इकाई को भी कैप्टिव माने जाने का प्रावधान है, जिससे उद्योग अपनी परियोजनाओं को इस प्रकार डिजाइन कर सकेंगे कि वे आसानी से डिस्कॉम के दायरे से बाहर निकल सकें।
क्रॉस सब्सिडी का ढांचा होगा कमजोर, घरेलू उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ने की आशंका
राकेश डी पी पाठक ने कहा कि वितरण कंपनियों की आय का मुख्य स्रोत बड़े औद्योगिक उपभोक्ता हैं, जो अपेक्षाकृत अधिक टैरिफ पर बिजली खरीदते हैं। इसी आय से घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं को क्रॉस-सब्सिडी दी जाती है। यदि बड़ी संख्या में उद्योग कैप्टिव पावर की ओर पलायन कर गए तो क्रॉस-सब्सिडी का पूरा ढांचा चरमरा जाएगा। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा और बिजली दरों में वृद्धि का जोखिम पैदा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे वितरण कंपनियों का वित्तीय घाटा तेजी से बढ़ेगा, जिससे उनके कर्मचारियों और पेंशनर्स का भविष्य भी असुरक्षित हो जाएगा।
सरकार से जनहित में संशोधन की मांग
फेडरेशन के महामंत्री ने कहा कि ये संशोधन वित्तीय रूप से पहले से ही तनावग्रस्त डिस्कॉम और आम उपभोक्ताओं की कीमत पर बड़े कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने वाले प्रतीत होते हैं। उन्होंने राज्य सरकार और केंद्र सरकार से अनुरोध किया है कि इन नए नियमों की व्यापक समीक्षा की जाए।
राकेश डी पी पाठक ने कहा, "समीक्षा में मुख्य रूप से वितरण कंपनियों के हितों, उनके कर्मचारियों और पेंशनर्स के सुरक्षित भविष्य तथा घरेलू एवं कृषि उपभोक्ताओं को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध कराने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए। यह जनहित में अत्यंत आवश्यक है।"
