नीलकंठ धाम,जिस स्थान पर बैठ भोलेनाथ ने विष पी थी, वहाँ उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब - Bhaskar Crime

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नीलकंठ धाम,जिस स्थान पर बैठ भोलेनाथ ने विष पी थी, वहाँ उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

सावन सोमवार विशेष: जिस स्थान पर बैठ भोलेनाथ ने विष पी थी, वहाँ उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

(हर-हर महादेव के जयघोष से गूँज रही गढ़वाल की पहाड़ियाँ)

(मनोज विश्वकर्मा चीफ एडिटर)

आज सावन का यह पहला/प्रमुख सोमवार अपने साथ वह प्राचीन गाथा बुनकर लाया है, जब भगवान ने खुद विष पीकर दुनिया को बचाया था। अगर आप भी ‘हर-हर महादेव’ के जाप के साथ इस नीलकंठ धाम के दर्शन करना चाहें, तो जल्दी चलें क्योंकि मानसून में यह सौंदर्य और आस्था का संगम और भी अनोखा हो जाता है सावन का सोमवार आज यहाँ सुबह 4 बजे से ही ‘ॐ नमः शिवाय’ के मंत्रों से वातावरण गुंजायमान है। विशेष अभिषेक (जल, दूध, धतूरा, बेलपत्र) का दौर दोपहर तक जारी रहेगा।

ट्रैक और यात्रा ऋषिकेश से करीब 12 किमी का रोमांचक वन-पथ। सावन की हरियाली और घने कोहरे के बीच यह चढ़ाई भक्तों को कठिन तपस्या का अहसास कराती है—कहते हैं, पैदल आने वालों की मनोकामना जरूर पूरी होती है।

ऐतिहासिक धरोहर यह मंदिर मात्र धार्मिक ही नहीं, बल्कि वास्तुकला का अमूल्य नमूना है। प्राचीन ग्रंथों में इसे 'शिव की गुप्त साधना-स्थली' कहा गया है।

 भक्तों की आस्था का आलम

महाराष्ट्र से आई भक्त रेखा शर्मा ने बताया "बारिश के बाद यहाँ का नजारा बिल्कुल केदारनाथ जैसा लगता है। विष पीने वाले भोलेबाबा के दर्शन करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।" इस बीच मंदिर प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए विशेष घंटी-मार्ग और प्रसाद वितरण की व्यवस्था की है।

1. वह दिव्य स्थल जहाँ रुक गया था प्रलय

गढ़वाल की बर्फीली चोटियों और घने वनों के बीच, समुद्र तल से करीब 1675 मीटर की ऊँचाई पर बसे ऋषिकेश के नीलकंठ महादेव मंदिर की महिमा सावन में चरम पर है। पौराणिक कथा गवाह है—जब सागर-मंथन से निकला हलाहल विष पूरे ब्रह्मांड को भस्म करने लगा, तो देव-दानव सहम गए। तब भगवान शिव ने इसी पर्वतीय शिखर को अपनी तपोभूमि बनाया और उस कालकूट को अपनी हथेली में उठाकर पी लिया। माँ पार्वती ने उसी क्षण उनका कंठ दबा दिया, ताकि जहर पेट तक न उतरे—और विष के प्रभाव से शिव का गला नीला (नील) पड़ गया। तभी से यह स्थान स्वयं 'नीलकंठ' के नाम से अमर है।

2. मानसून में झरने की ठंडक और अहसास

मंदिर परिसर के अंदर ही एक प्राकृतिक जलधारा (झरना) फूटती है। खास बात—श्रद्धालु गर्भगृह में प्रवेश से पहले इस स्वच्छ, बर्फीली धारा में स्नान करते हैं। मान्यता है कि इस जल में डुबकी लगाने से मानसिक और शारीरिक पाप धुल जाते हैं। सावन के इस सोमवार को तो यहाँ हजारों भक्त एक-एक बूँद को गंगाजल के समान पवित्र मानकर नहाते हुए दिखे।

3. नक्काशी और चित्रकला का अनोखा संगम

· शिखर पर अंकित सृष्टि-रहस्य: मंदिर के गगनचुंबी शिखर के आधार पर समुद्र-मंथन का अद्भुत शिल्पचित्र उकेरा गया है—जिसमें मंथन में लगा मेरु पर्वत, वासुकि नाग और देवासुर संग्राम सजीव दिखता है।

· गर्भगृह द्वार की विशाल पेंटिंग: प्रवेश-द्वार पर बनी विराट पेंटिंग में भगवान शिव विषपान करते हुए अंकित हैं उनके गले का नीलापन, माँ पार्वती का चिंतित मुखमंडल और पास में खड़े हुए घबराए देवता, सब कुछ इतना यथार्थ कि भक्त साक्षात उस काल-घटना का अनुभव करते हैं।

4. सामने पहाड़ी पर विराजती अर्धांगिनी

मंडप से ठीक सामने की पहाड़ी पर माता पार्वती का प्राचीन मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि जब भोलेनाथ विषपान कर रहे थे, तो माँ पार्वती ने अपने हाथों का स्पर्श देकर विष की तीव्रता को कम किया—इसलिए यहाँ नीलकंठ के साथ पार्वती जी की पूजा का विशेष महत्व है। दोनों मंदिर एक-दूसरे की ओर देखते हैं, जैसे संहारक और पालनहारी की शाश्वत युगल-प्रतिमा हो।

                "देवों के देव हर हर महादेव"