बुंदेली अस्मिता का महाकुंभ: डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 110वीं जयंती धूमधाम से मना
'बुंदेली दिवस', कला-साहित्य की अनेक हस्तियां हुईं सम्मानित
विशेष रिपोर्टर क्राइम भास्कर न्यूज जबलपुर, बुंदेलखंड की गौरवशाली लोक परंपराओं, मधुर बोली, समृद्ध साहित्य और अमिट सांस्कृतिक विरासत के प्रहरी, महान भाषाविज्ञानी एवं शिक्षाविद् डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 110वीं जयंती के उपलक्ष्य में सोमवार को शहीद स्मारक भवन, जबलपुर में भव्य एवं ऐतिहासिक 'बुंदेली दिवस' समारोह का आयोजन किया गया। गुंजन कला सदन एवं नगर की विभिन्न साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के सामूहिक सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम ने बुंदेली गौरव को एक नई ऊंचाई प्रदान की, जहां एक ओर जहां बुंदेली धरती की प्रतिभाओं को सराहा गया, वहीं दूसरी ओर डॉ. श्रीवास्तव के अतुलनीय योगदान को सादर नमन किया गया।
पिपरहटा से जबलपुर तक: एक सांस्कृतिक यात्रा की 110 वर्षों की गाथा
01 सितंबर 1916 को कटनी जिले के सुदूर ग्राम पिपरहटा में जन्मे डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने अपनी पूरी कर्मभूमि जबलपुर को बनाया और इस धरती को बुंदेली संस्कृति का संरक्षण केंद्र बना दिया। ऐसे दौर में जब देश में हिंदी और अंग्रेजी के दबदबे के चलते क्षेत्रीय बोलियाँ विलुप्त होने के कगार पर थीं, डॉ. श्रीवास्तव ने बुंदेली को संजोने, उसका व्याकरण लिखने, लोकगीतों, लोकोक्तियों और लोककथाओं को संकलित करने का जीवनभर अथक परिश्रम किया। उनके इसी अदम्य समर्पण को याद रखते हुए जबलपुर की साहित्यिक संस्थाएं प्रतिवर्ष उनका जन्मदिन 'बुंदेली दिवस' के रूप में मनाती हैं, जो आज पूरे बुंदेलखंड की सांस्कृतिक एकता का पर्व बन चुका है।
दीप प्रज्ज्वलन से लेकर नृत्य नाटिका तक: सांस्कृतिक रंगारंग कार्यक्रमों की शृंखला
समारोह का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं डॉ. श्रीवास्तव के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इस पावन अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार प्रभा विश्वकर्मा "शील", तरुणा खरे एवं डॉ. दीपक शुक्ला की नवीन पुस्तकों का विधिवत लोकार्पण किया गया, जो साहित्य जगत के लिए एक उपहार से कम नहीं था।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव द्वारा रचित प्रसिद्ध खंडकाव्य 'वीरांगना रानी दुर्गावती' पर आधारित मनोहारी नृत्य नाटिका का मंचन। इस भव्य प्रस्तुति ने वीरांगना के बलिदान और साहस की गाथा को जीवंत कर दिया। नृत्य नाटिका का कुशल निर्देशन मोती शिवहरे ने किया, जबकि संगीत संयोजन के जादूगर पं. रुद्रदत्त ने अपनी धुनों से पूरे भवन को गुंजायमान कर दिया। दर्शक इस प्रस्तुति पर मंत्रमुग्ध हो गए और बुंदेली कला की गहराई को सराहा।
जनप्रतिनिधियों से लेकर साहित्यकारों तक: खास मेहमानों की भरमार
इस ऐतिहासिक अवसर पर दमोह सांसद राहुल सिंह लोधी, स्थानीय विधायक अभिलाष पांडे, विधायक संदीप जैन तथा संस्था के संरक्षक अजय विश्नोई विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं, कटनी से समिति के सक्रिय सहयोगी राजेंद्र सिंह ठाकुर, भोपाल से डॉ. अनिता श्रीवास्तव और लखनादौन से नमिता श्रीवास्तव की खास उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया। इन सभी वक्ताओं ने डॉ. श्रीवास्तव के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अपने विचार रखे और बुंदेली भाषा के भविष्य पर चिंतन प्रस्तुत किया।
प्रतिष्ठित हस्तियों का नागरिक अभिनंदन: जहां विज्ञान, पुलिस, न्यायपालिका और अध्यात्म का हुआ सम्मान
समारोह का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली विभूतियों का सम्मान। इस अवसर पर निम्नलिखित गणमान्य व्यक्तियों को शाल, श्रीफल, साफा एवं स्मृति चिन्ह भेंटकर नागरिक अभिनंदन किया गया:
· डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक रितेश कुमार विश्वकर्मा — रक्षा अनुसंधान में उत्कृष्ट योगदान के लिए।
· पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय कानून-व्यवस्था और जनसेवा के लिए।
· नरसिंह देवाचार्य महाराज धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य के लिए।
· जिला अधिवक्ता संघ अध्यक्ष मनीष मिश्रा न्यायपालिका में सक्रिय भूमिका के लिए।
· अधिवक्ता असीम त्रिवेदी विधिक सेवाओं में समर्पण के लिए।
· डॉ. शिव कुमार व्यास शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में योगदान हेतु।
· डॉ. दीपक शुक्ला साहित्य सृजन एवं शोध के लिए।
इनके अलावा कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं शिक्षाविदों को भी इस मंच से सम्मानित किया गया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि बुंदेली संस्कृति सिर्फ कला तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में फैली हुई है।
'बुंदेली नृत्यश्री' प्रतियोगिता: प्रतिभाओं की धाकड़ प्रस्तुति
बुंदेली नृत्य की पारंपरिक विधाओं को जीवंत रखने के लिए आयोजित 'बुंदेली नृत्यश्री' प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने अपने अद्भुत नृत्य कौशल से सभी को चकित कर दिया। निर्णायक मंडल ने कड़ी टक्कर के बाद परिणाम घोषित किए:
· सीनियर वर्ग में 'नृत्यश्री अलंकरण' आशिता कुमार और नताशा केशर को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया।
· 'उप नृत्यश्री अलंकरण' आरोही चौरसिया को प्रदान किया गया।
इसके अतिरिक्त, नृत्य क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए नृत्य गुरु सारंग शिवहरे एवं अंकिता गिनारा को श्रीमती लता तिवारी स्मृति सम्मान से नवाजा गया, जिसमें नकद राशि, शाल, श्रीफल एवं पारंपरिक साफा भेंट किया गया। इस सम्मान ने बुंदेली नृत्य की गुरु-शिष्य परंपरा को और सशक्त किया।
संचालन एवं आभार: कार्यक्रम की सफलता के सूत्रधार
इस भव्य आयोजन का सफल एवं सुचारु संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी एवं साहित्यकार राजेश पाठक "प्रवीण" ने किया, जिन्होंने अपनी सरस वाणी से पूरे कार्यक्रम को बांधे रखा। अंत में कार्यक्रम की सफलता के लिए सभी अतिथियों, कलाकारों, सहयोगियों एवं दर्शकों का आभार प्रदर्शन संस्था के वरिष्ठ सदस्य विक्रम परवार ने किया, जिन्होंने आने वाले वर्षों में और भी बड़े स्तर पर बुंदेली दिवस मनाने का संकल्प व्यक्त किया।
संक्षेप में कार्यक्रम की मुख्य झलकियाँ
मुख्य आयोजन बुंदेली दिवस, डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 110वीं जयंती
स्थान शहीद स्मारक भवन, जबलपुर
संयोजक गुंजन कला सदन एवं अन्य साहित्यिक-सामाजिक संस्थाएँ
विशेष प्रस्तुति 'वीरांगना रानी दुर्गावती' पर नृत्य नाटिका (निर्देशक: मोती शिवहरे, संगीत: पं. रुद्रदत्त)
पुस्तक विमोचन प्रभा विश्वकर्मा, तरुणा खरे, डॉ. दीपक शुक्ला
प्रमुख अतिथि सांसद राहुल सिंह लोधी, विधायक अभिलाष पांडे, संदीप जैन, अजय विश्नोई
विशेष उपस्थिति राजेंद्र ठाकुर (कटनी), डॉ. अनिता श्रीवास्तव (भोपाल), नमिता श्रीवास्तव (लखनादौन)
सम्मानित हस्तियाँ रितेश विश्वकर्मा, संपत उपाध्याय, नरसिंह देवाचार्य, मनीष मिश्रा, असीम त्रिवेदी, डॉ. व्यास, डॉ. शुक्ला आदि
नृत्यश्री पुरस्कार आशिता कुमार, नताशा केशर (नृत्यश्री), आरोही चौरसिया (उप नृत्यश्री)
विशेष सम्मान सारंग शिवहरे, अंकिता गिनारा (लता तिवारी स्मृति सम्मान)
यह 'बुंदेली दिवस' न केवल एक स्मरणोत्सव था, बल्कि बुंदेली भाषा, संगीत, नृत्य, साहित्य और वीरता की अमर गाथा का सजीव प्रमाण था। डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव के सपने को साकार करते हुए जबलपुर ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि बुंदेली संस्कृति आज भी जीवित, जागरूक एवं गर्वोन्नत है।